Friday, 29 January 2016

ज़िन्दगी

समंदर में नैया पड़ी है हमारी |
दिशाहीन हम तो बहे जा रहे हैं ||
किनारा ना कोई सहारा ना कोई |
हवा के सहारे बढे जा रहे है ||
नज़ारे भी दिखते बहारें भी दिखती |
उन्हें दूर से देख खुश हो रहे हैं ||
मिलेंगी कभी तो हमें भी ये खुशियाँ |
तुम्हें देख ऊपर ये हम पूछते हैं ||
बहुत दूर पे एक रोशनी है दिखती |
उसे देख कर हम चले जा रहे हैं ||
शिकवा न कोई शिकायत न कोई |
मिला है जो जीवन जिए जा रहे हैं ||

2 comments:

  1. किनारा ना कोई सहारा ना कोई
    हवा के सहारे बढे जा रहे हैं ।।

    बहुत खूब बयां किया है ज़िन्दगी को आपने
    ज़िन्दगी ऐसी ही है

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    1. शुक्रिया... तुम्हारा प्रोत्साहन मुझे हमेशा प्रेरणा देता है

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