Tuesday, 9 June 2015

एक लड़की की दास्ताँ

 आज जाने क्यों संसार की हर लड़की की कहानी एक जैसी लगती है | अंदर झांक कर देखो तो शायद किसी में कुछ कम या ज्यादा दुःख हो पर ऊपरी तौर पर देखने से हर लड़की की कहानी एक सी लगती है ........
    जब उसका जन्म होता है हर किसी के चेहरे पर उदासी छा जाती है | लोग थोड़े दर्द के साथ एक दूसरे को बताते है कि लड़की हुई है या फिर कोई अपने को संतोष देने के लिए कहते है कि "लक्ष्मी आई हैं "|
धीरे-धीरे बे टी किसी खिलोने की भांति सब को प्यारी लगने लगती है और लोग "हमारे लिए बेटी-बेटा एक समान है" या फिर "बेटियाँ ज्यादा प्यारी होती है "कह कर एक दूसरे को या खुद को संतोष देते नज़र आते हैं | थोड़ी बड़ी होने के साथ ही वह छोटे -छोटे हाथों से छोटे -छोटे काम करने लगती है | नाचती-गाती-पोएम सुनाती और सबके मन को बहलाती ;पढ़ने की उम्र आ जाती है |
    घर में लोग निर्णय लेकर ठीक-ठाक स्कूल में एडमिशन करा देते हैं | ये सोचकर कि आज-कल लोग कैसी लड़कियां पसंद करते हैं उसी तरह उसकी परवरिश करते हैं और वक्त-बेवक्त उसे टोकते रहते हैं कि ऐसे रहो ऐसे बोलो क्योंकि तुम्हे ससुराल जाना है वहां किसी को ऐसा वैसा पसंद नहीं आएगा |
  धीरे-धीरे काम-काज के साथ-साथ पढाई करते हुए वह काफ़ी तेज़ निकल जाती है |ऊंचे-ऊंचे सपने देखने लगती है तो लोगों को लगता है कि ज्यादा उड़ रही है इसके "पर "नहीं कांटे गये तो एक दिन बदनामी करा देगी और बात-बात पर अड़ंगा लगाकर ;मजबूरियो का रोना रोकर उसके "परो "को काट दिया जाता है |
 और वह महान बनते हुए माँ-पिता की इज्ज़त बचाने के लिए अपना भविष्य स्वाहा कर देती है और अपने सारे गुणों को संजोकर अपने घर को सजाने-सवारने और स्टैण्डर्ड बढाने में लग जाती है लोग बड़े खुश होते है ;एक-दूसरे से तारीफ़ करते है पर एक काम
 और करते हैं बेटी को अहसास दिलाना शुरू करते है कि तुम्हें "अपने "घर जाना है यहाँ सब कुछ पराया है और वह अजीब कशमकश के झूले में झूलने लगती है .......किसे अपना समझूँ "इसे या उसे जो अभी पता नहीं कहाँ है" |
  अब वह "अपने घर " जाने के सपने देखने लगती हैं कि कोई राजकुमार आएगा , पलको पे बिठा के ले जायेगा वहां सब कुछ अपना होगा | पर यहाँ भी शुरू होता है रोज़ किसी सामान की तरह सज कर नुमाइश बनने का सिलसिला , फिर नापसंद होने पर रोज़ दुखी होके एक-एक सपनो के टूटने के दर्द का सिलसिला .......  
  सारे सपनो के टूटने के बाद कोई भी लड़का देखने आता है और अगर वह हाँ कर देता है , तो उसके और उसके परिवार वालों का लाख-लाख एहसान मानते हुए शुरू होता है उन लोगो की खातिरदारी और देन-लेन का सिलसिला | जिसका एहसान हर वक्त लड़की के सिर चढ़ता है कि तेरी शादी में तो इतना खर्च कर रहे हैं सब तुम्हारी ख़ुशी के लिए .......
     यह एहसान अपने सिर लेकर वह ससुराल पहुँचती है और लोगो के ताने शुरू होते हैं कि तुम्हारे माँ-बाप ने किया ही क्या है , इससे ज्यादा तो औरो के करते हैं | यहाँ उसका सबसे बड़ा सपना टूटता है कि यह घर भी अपना नही है क्योंकि हर कदम पे लगता है सही से रहो वरना "तुम्हारे घर " मायके छोड़ आयेंगे |
   यहाँ रहती है तो मायके वालों की लाज़ इज्ज़त बचाने की कोशिश करती है मायके जाती है और लोग ससुराल वालों को कुछ कहते है तो वहां की इज्ज़त बचाती है |इन सबमे उसका "अपना अस्तित्व "कहाँ गुम हो जाता है पता ही नहीं चलता |
   कुछ ही दिन में लोग उससे उम्मीद पालने लगते है कि वह इस घर के वारिस को जन्म दे और उसे भी लगता है कि नारी की संपूर्णता इसी में है |वह गर्भ धारण करती है घर में सभी उसे अतिरिक्त प्यार और केयर देने लगते हैं वह बड़ी खुश होती है कि उसे सब कुछ मिल गया पर बच्चे के जन्म के बाद सारा प्यार बच्चे के नाम आ जाता है और मिलती है हर वक्त डांट और बच्चे को सही से पालने की हिदायतें |घर के कामों और बच्चे की परवरिश के साथ जिंदगी कितनी जल्दी भागती है पता ही नहीं चलता .......
    जब बच्चा पढ़ने लायक होता है उसे याद आते हैं अपने बचपन के सपने 'कुछ बनने के सपने और वह पूरी तरह अपने बच्चे के साथ अपने सपने भी पूरा करने की कोशिश में लग जाती है |
   सारी हिम्मत और ताक़त बटोरकर बच्चे को बड़ा करती है उसे कुछ बनाती है अब निश्चिंत होती है कि अब सब कुछ अपना है अपने हिसाब से चलेगा पर फिर बच्चे की शादी और कुछ ही दिन बाद फिर वही अपना पराया वाला झगड़ा .......|
और पता चलता है कि बच्चे पर भी अपने से ज्यादा उसकी पत्नी और बच्चों का हक़ है |
       अब शुरू होता है बहू और पोते-पोतियों को सँभालने का सिलसिला 'जो कुछ सालों बाद अचानक बच्चे की ग्रहस्थी अलग होने के साथ ही टूट जाता है और रह जाती है "तन्हाई-तन्हाई "और आज भी अपने ही जीवन से "पराई "होने का दर्द ..................


7 comments:

  1. क्या बात है ... सबसे पहले तो मैं कहना चाहूंगी कि आपने एक लड़की की पूरी कि पूरी ज़िन्दगी को कुछ ही नपे-तुले शब्दों में व्यक्त कर डाला है ... जो कि हर लड़की की ज़िन्दगी का पहलू है |
    और खास करके मुझे आखिरी लाइन बहुत ही अच्छी लगी "रह जाती है तन्हाई-तन्हाई और आज भी अपने ही जीवन से पराई होने का दर्द"
    बहुत खूब ... लिखते रहिये

    ReplyDelete
    Replies
    1. शुक्रिया.....शुक्रिया आपके ही प्रोत्साहन का परिणाम है

      Delete
    2. अब इसे बरक़रार रखियेगा

      Delete
  2. ब्लॉग के जगत में आपके आने पर बधाई !
    पहली पोस्ट में ही आपने हमारे समाज को एक आइना दिखाया ...
    लिखना जारी रखिये

    ReplyDelete
    Replies
    1. धन्यवाद.....आपके दोनों के बिना ये कहाँ हो पता :)

      Delete
  3. वाह.. बहुत उन्दा..
    ज़िन्दगी की तलाश करते रहे हम ज़िन्दगी भर..
    जब ज़िन्दगी का आइना सामने आया.. तब देखा क्या पाया क्या खोया
    वाकई शब्दों में जादू है.. आपके अगले ब्लॉग का इन्तेज़ार रहेगा..

    ReplyDelete
  4. धन्यवाद प्रांशु भैया आपका प्रोत्साहन मन को छू गया|

    ReplyDelete