aaaderneey dady, sadar pranam , apko aashcharay hoga, aaj email, fax,msg ke yug me mera patr !apko shayad atpata lge .apki yad to hamesh hi aati hai pr aaj bachpan ki har bat chalchitr ki tarah ghoom rhi hai . aaj apne teenager bachche ko samjhate hue, nirasha se nikalne ka pryas kr rhi thi.usne janna chaha ki mujhe aisa kb lgta tha aur mai kya krti thi. use batate hue, mujhe apni isi age ki,sare shouko ki, hr cheez seekhne ke junoon ki aur nadaniyo ki bate yad aane lgi.sath hi apki hr samajh dari bhari bate yad ane lgi. lga bhut kosiso ke bad bhi mai apne bachcho ki utni achchi dost ni ban pa rhi hoo jitne achche aap hum loge ke dost the. kaise mai school ki har bat aapse share krti thi,har choti badi bato pr aapse raay leti thi ! itna visvas yuuu hi to ni tha! apni friends ke letters dikhati, filmo ke bare me bate krti, carom cards khelti......
.aapki samjhdari, sahan sheelta aur har cheez ko badlte jamane ki nazar se dekna, apko world ke anya dads se, bilkul alag krti thi ..........panch panch ladkiyo ke hone par bhi, kafi presure ghar walo ka hone pr bhi aap hum logo ko sab kuch sikhana chahte the,har varsh kisi trip pr le jate the .ye sab sabit krta hai ki aap hume sampoorna dekhna chahate the ..aur banaya bhi . tabhi to itni atpati jindgi milne pr bhi mai poori himmat ke sath apne bachcho ko ek sampoorna vyaktitva ka swami banana chahti hoo.lgta hai pyar aur shoukh poore krne ke sath hi dono ko aisa bana saku ki jindgi me kaisa bhi time aaye ye dono na toote ,na hare,hamesha mazbuti aur khusiyo ke sath jindgi jiye....jb kabhi apne ko kamjor aur niras pati hoo to mujhe do cheeze bada sambhal deti hai ek to bhagvan pr visvas aur apka mujh pr visvas,ki meri beti sb kr sakti hai,ye to meri sher hai".yad krte hi mai punah himmat se bhar jati hoo, aur lgta hai mera bhi farz hai ki mai apne bachcho ko har art me nipun banau jis se ye kabhi ruke ni ,saflta ke path pr aage aur aage hi badte jaye ..... Apki beti
Ritu
मन का सागर
मन में उठते विचारों के हिलोरों को शब्द की किस्ती पे बिठा कर साहिल तक पहुँचाने की कोशिश
Sunday, 17 September 2017
ek patra pita ke nam
Friday, 29 January 2016
ज़िन्दगी
समंदर में नैया पड़ी है हमारी |
दिशाहीन हम तो बहे जा रहे हैं ||
किनारा ना कोई सहारा ना कोई |
हवा के सहारे बढे जा रहे है ||
नज़ारे भी दिखते बहारें भी दिखती |
उन्हें दूर से देख खुश हो रहे हैं ||
मिलेंगी कभी तो हमें भी ये खुशियाँ |
तुम्हें देख ऊपर ये हम पूछते हैं ||
बहुत दूर पे एक रोशनी है दिखती |
उसे देख कर हम चले जा रहे हैं ||
शिकवा न कोई शिकायत न कोई |
मिला है जो जीवन जिए जा रहे हैं ||
दिशाहीन हम तो बहे जा रहे हैं ||
किनारा ना कोई सहारा ना कोई |
हवा के सहारे बढे जा रहे है ||
नज़ारे भी दिखते बहारें भी दिखती |
उन्हें दूर से देख खुश हो रहे हैं ||
मिलेंगी कभी तो हमें भी ये खुशियाँ |
तुम्हें देख ऊपर ये हम पूछते हैं ||
बहुत दूर पे एक रोशनी है दिखती |
उसे देख कर हम चले जा रहे हैं ||
शिकवा न कोई शिकायत न कोई |
मिला है जो जीवन जिए जा रहे हैं ||
Saturday, 27 June 2015
Tuesday, 9 June 2015
सुख ???
लम्बी ऊम्र की कामना या ज्यादा जीवित रहने की इच्छा शायद हर जीव में होती है इसीलिए बड़े बुजुर्ग शायद "आयुष्मान भव् "या "जीते रहो "का आशीर्वाद देते है |पर जीवित रहने या सुखपूर्वक जीने में जमीन-आसमान का अंतर है |
कौन सुखी है इस संसार में या किस तरह की स्थित को सुख कहते है यह मापदंड हर किसी का अलग-अलग है |
कौन सुखी है इस संसार में या किस तरह की स्थित को सुख कहते है यह मापदंड हर किसी का अलग-अलग है |
एक लड़की की दास्ताँ
आज जाने क्यों संसार की हर लड़की की कहानी एक जैसी लगती है | अंदर झांक कर देखो तो शायद किसी में कुछ कम या ज्यादा दुःख हो पर ऊपरी तौर पर देखने से हर लड़की की कहानी एक सी लगती है ........
जब उसका जन्म होता है हर किसी के चेहरे पर उदासी छा जाती है | लोग थोड़े दर्द के साथ एक दूसरे को बताते है कि लड़की हुई है या फिर कोई अपने को संतोष देने के लिए कहते है कि "लक्ष्मी आई हैं "|
धीरे-धीरे बे टी किसी खिलोने की भांति सब को प्यारी लगने लगती है और लोग "हमारे लिए बेटी-बेटा एक समान है" या फिर "बेटियाँ ज्यादा प्यारी होती है "कह कर एक दूसरे को या खुद को संतोष देते नज़र आते हैं | थोड़ी बड़ी होने के साथ ही वह छोटे -छोटे हाथों से छोटे -छोटे काम करने लगती है | नाचती-गाती-पोएम सुनाती और सबके मन को बहलाती ;पढ़ने की उम्र आ जाती है |
घर में लोग निर्णय लेकर ठीक-ठाक स्कूल में एडमिशन करा देते हैं | ये सोचकर कि आज-कल लोग कैसी लड़कियां पसंद करते हैं उसी तरह उसकी परवरिश करते हैं और वक्त-बेवक्त उसे टोकते रहते हैं कि ऐसे रहो ऐसे बोलो क्योंकि तुम्हे ससुराल जाना है वहां किसी को ऐसा वैसा पसंद नहीं आएगा |
धीरे-धीरे काम-काज के साथ-साथ पढाई करते हुए वह काफ़ी तेज़ निकल जाती है |ऊंचे-ऊंचे सपने देखने लगती है तो लोगों को लगता है कि ज्यादा उड़ रही है इसके "पर "नहीं कांटे गये तो एक दिन बदनामी करा देगी और बात-बात पर अड़ंगा लगाकर ;मजबूरियो का रोना रोकर उसके "परो "को काट दिया जाता है |
और वह महान बनते हुए माँ-पिता की इज्ज़त बचाने के लिए अपना भविष्य स्वाहा कर देती है और अपने सारे गुणों को संजोकर अपने घर को सजाने-सवारने और स्टैण्डर्ड बढाने में लग जाती है लोग बड़े खुश होते है ;एक-दूसरे से तारीफ़ करते है पर एक काम
और करते हैं बेटी को अहसास दिलाना शुरू करते है कि तुम्हें "अपने "घर जाना है यहाँ सब कुछ पराया है और वह अजीब कशमकश के झूले में झूलने लगती है .......किसे अपना समझूँ "इसे या उसे जो अभी पता नहीं कहाँ है" |
अब वह "अपने घर " जाने के सपने देखने लगती हैं कि कोई राजकुमार आएगा , पलको पे बिठा के ले जायेगा वहां सब कुछ अपना होगा | पर यहाँ भी शुरू होता है रोज़ किसी सामान की तरह सज कर नुमाइश बनने का सिलसिला , फिर नापसंद होने पर रोज़ दुखी होके एक-एक सपनो के टूटने के दर्द का सिलसिला .......
सारे सपनो के टूटने के बाद कोई भी लड़का देखने आता है और अगर वह हाँ कर देता है , तो उसके और उसके परिवार वालों का लाख-लाख एहसान मानते हुए शुरू होता है उन लोगो की खातिरदारी और देन-लेन का सिलसिला | जिसका एहसान हर वक्त लड़की के सिर चढ़ता है कि तेरी शादी में तो इतना खर्च कर रहे हैं सब तुम्हारी ख़ुशी के लिए .......
यह एहसान अपने सिर लेकर वह ससुराल पहुँचती है और लोगो के ताने शुरू होते हैं कि तुम्हारे माँ-बाप ने किया ही क्या है , इससे ज्यादा तो औरो के करते हैं | यहाँ उसका सबसे बड़ा सपना टूटता है कि यह घर भी अपना नही है क्योंकि हर कदम पे लगता है सही से रहो वरना "तुम्हारे घर " मायके छोड़ आयेंगे |
यहाँ रहती है तो मायके वालों की लाज़ इज्ज़त बचाने की कोशिश करती है मायके जाती है और लोग ससुराल वालों को कुछ कहते है तो वहां की इज्ज़त बचाती है |इन सबमे उसका "अपना अस्तित्व "कहाँ गुम हो जाता है पता ही नहीं चलता |
कुछ ही दिन में लोग उससे उम्मीद पालने लगते है कि वह इस घर के वारिस को जन्म दे और उसे भी लगता है कि नारी की संपूर्णता इसी में है |वह गर्भ धारण करती है घर में सभी उसे अतिरिक्त प्यार और केयर देने लगते हैं वह बड़ी खुश होती है कि उसे सब कुछ मिल गया पर बच्चे के जन्म के बाद सारा प्यार बच्चे के नाम आ जाता है और मिलती है हर वक्त डांट और बच्चे को सही से पालने की हिदायतें |घर के कामों और बच्चे की परवरिश के साथ जिंदगी कितनी जल्दी भागती है पता ही नहीं चलता .......
जब बच्चा पढ़ने लायक होता है उसे याद आते हैं अपने बचपन के सपने 'कुछ बनने के सपने और वह पूरी तरह अपने बच्चे के साथ अपने सपने भी पूरा करने की कोशिश में लग जाती है |
सारी हिम्मत और ताक़त बटोरकर बच्चे को बड़ा करती है उसे कुछ बनाती है अब निश्चिंत होती है कि अब सब कुछ अपना है अपने हिसाब से चलेगा पर फिर बच्चे की शादी और कुछ ही दिन बाद फिर वही अपना पराया वाला झगड़ा .......|
और पता चलता है कि बच्चे पर भी अपने से ज्यादा उसकी पत्नी और बच्चों का हक़ है |
अब शुरू होता है बहू और पोते-पोतियों को सँभालने का सिलसिला 'जो कुछ सालों बाद अचानक बच्चे की ग्रहस्थी अलग होने के साथ ही टूट जाता है और रह जाती है "तन्हाई-तन्हाई "और आज भी अपने ही जीवन से "पराई "होने का दर्द ..................
जब उसका जन्म होता है हर किसी के चेहरे पर उदासी छा जाती है | लोग थोड़े दर्द के साथ एक दूसरे को बताते है कि लड़की हुई है या फिर कोई अपने को संतोष देने के लिए कहते है कि "लक्ष्मी आई हैं "|
धीरे-धीरे बे टी किसी खिलोने की भांति सब को प्यारी लगने लगती है और लोग "हमारे लिए बेटी-बेटा एक समान है" या फिर "बेटियाँ ज्यादा प्यारी होती है "कह कर एक दूसरे को या खुद को संतोष देते नज़र आते हैं | थोड़ी बड़ी होने के साथ ही वह छोटे -छोटे हाथों से छोटे -छोटे काम करने लगती है | नाचती-गाती-पोएम सुनाती और सबके मन को बहलाती ;पढ़ने की उम्र आ जाती है |
घर में लोग निर्णय लेकर ठीक-ठाक स्कूल में एडमिशन करा देते हैं | ये सोचकर कि आज-कल लोग कैसी लड़कियां पसंद करते हैं उसी तरह उसकी परवरिश करते हैं और वक्त-बेवक्त उसे टोकते रहते हैं कि ऐसे रहो ऐसे बोलो क्योंकि तुम्हे ससुराल जाना है वहां किसी को ऐसा वैसा पसंद नहीं आएगा |
धीरे-धीरे काम-काज के साथ-साथ पढाई करते हुए वह काफ़ी तेज़ निकल जाती है |ऊंचे-ऊंचे सपने देखने लगती है तो लोगों को लगता है कि ज्यादा उड़ रही है इसके "पर "नहीं कांटे गये तो एक दिन बदनामी करा देगी और बात-बात पर अड़ंगा लगाकर ;मजबूरियो का रोना रोकर उसके "परो "को काट दिया जाता है |
और वह महान बनते हुए माँ-पिता की इज्ज़त बचाने के लिए अपना भविष्य स्वाहा कर देती है और अपने सारे गुणों को संजोकर अपने घर को सजाने-सवारने और स्टैण्डर्ड बढाने में लग जाती है लोग बड़े खुश होते है ;एक-दूसरे से तारीफ़ करते है पर एक काम
और करते हैं बेटी को अहसास दिलाना शुरू करते है कि तुम्हें "अपने "घर जाना है यहाँ सब कुछ पराया है और वह अजीब कशमकश के झूले में झूलने लगती है .......किसे अपना समझूँ "इसे या उसे जो अभी पता नहीं कहाँ है" |
अब वह "अपने घर " जाने के सपने देखने लगती हैं कि कोई राजकुमार आएगा , पलको पे बिठा के ले जायेगा वहां सब कुछ अपना होगा | पर यहाँ भी शुरू होता है रोज़ किसी सामान की तरह सज कर नुमाइश बनने का सिलसिला , फिर नापसंद होने पर रोज़ दुखी होके एक-एक सपनो के टूटने के दर्द का सिलसिला .......
सारे सपनो के टूटने के बाद कोई भी लड़का देखने आता है और अगर वह हाँ कर देता है , तो उसके और उसके परिवार वालों का लाख-लाख एहसान मानते हुए शुरू होता है उन लोगो की खातिरदारी और देन-लेन का सिलसिला | जिसका एहसान हर वक्त लड़की के सिर चढ़ता है कि तेरी शादी में तो इतना खर्च कर रहे हैं सब तुम्हारी ख़ुशी के लिए .......
यह एहसान अपने सिर लेकर वह ससुराल पहुँचती है और लोगो के ताने शुरू होते हैं कि तुम्हारे माँ-बाप ने किया ही क्या है , इससे ज्यादा तो औरो के करते हैं | यहाँ उसका सबसे बड़ा सपना टूटता है कि यह घर भी अपना नही है क्योंकि हर कदम पे लगता है सही से रहो वरना "तुम्हारे घर " मायके छोड़ आयेंगे |
यहाँ रहती है तो मायके वालों की लाज़ इज्ज़त बचाने की कोशिश करती है मायके जाती है और लोग ससुराल वालों को कुछ कहते है तो वहां की इज्ज़त बचाती है |इन सबमे उसका "अपना अस्तित्व "कहाँ गुम हो जाता है पता ही नहीं चलता |
कुछ ही दिन में लोग उससे उम्मीद पालने लगते है कि वह इस घर के वारिस को जन्म दे और उसे भी लगता है कि नारी की संपूर्णता इसी में है |वह गर्भ धारण करती है घर में सभी उसे अतिरिक्त प्यार और केयर देने लगते हैं वह बड़ी खुश होती है कि उसे सब कुछ मिल गया पर बच्चे के जन्म के बाद सारा प्यार बच्चे के नाम आ जाता है और मिलती है हर वक्त डांट और बच्चे को सही से पालने की हिदायतें |घर के कामों और बच्चे की परवरिश के साथ जिंदगी कितनी जल्दी भागती है पता ही नहीं चलता .......
जब बच्चा पढ़ने लायक होता है उसे याद आते हैं अपने बचपन के सपने 'कुछ बनने के सपने और वह पूरी तरह अपने बच्चे के साथ अपने सपने भी पूरा करने की कोशिश में लग जाती है |
सारी हिम्मत और ताक़त बटोरकर बच्चे को बड़ा करती है उसे कुछ बनाती है अब निश्चिंत होती है कि अब सब कुछ अपना है अपने हिसाब से चलेगा पर फिर बच्चे की शादी और कुछ ही दिन बाद फिर वही अपना पराया वाला झगड़ा .......|
और पता चलता है कि बच्चे पर भी अपने से ज्यादा उसकी पत्नी और बच्चों का हक़ है |
अब शुरू होता है बहू और पोते-पोतियों को सँभालने का सिलसिला 'जो कुछ सालों बाद अचानक बच्चे की ग्रहस्थी अलग होने के साथ ही टूट जाता है और रह जाती है "तन्हाई-तन्हाई "और आज भी अपने ही जीवन से "पराई "होने का दर्द ..................
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